भारतीय राजनीति में कैकेयी वाला कोप भवन

अयोध्या को रामराज्य मिलने वाला था,  श्री राम जी का राजतिलक होने जा रहा है इस उद्घोष ने मंथरा जैसी स्वार्थी लम्पट को विचलित कर दिया। वह कैकयी की जिव्हा पर स्वर हो गई और उसे कोपभवन जाने को मजबूर कर दिया। मंथरा ने कैकयी के मन में मोह मत्सर के बीज अंकुरित कर दिये, उसके मन में एक अनजाने भय को उत्पन्न किया और झूठी आशाएं जगाकर उसे स्वार्थ भरी दलदल की ओर धकेल दिया। वह अपना भला बुरा भुल गई, साथ ही महाराज दशरथ के अनन्य प्रेम को भी। कैकयी, जिसकी वीरता को महाराज दशरथ बारम्बार प्रणाम करते थे, वह स्वार्थ वश सारी सीमाओं को लांघ गई। स्वार्थपरायणता के वशीभूत देश हित भुल गई, यह भी भान नहीं रहा कि उसके स्वयं के लिए क्या उचित अनुचित है। इसके लिए कैकयी को क्या कुछ नहीं खोना पड़ा? भरत जी जैसे सत्पुरुष ने आकर उसकी आँखे खोली ,पर तब तक देर हो चुकी थी, कैकयी असमय विधवा हो चुकी थी और अपने पुत्र भरत सहित अयोध्या की सारी प्रजा की नजरों से वह गिर चुकी थी।

क्या भारतीय राजनीति का चरित्र उसी मंथरा व कैकयी वाले संयुक्त योजन से विकृति को प्राप्त हो चूका है?

मोदी सरकार के आने से पहले तक केंद्र व राज्य सरकारों के गठन के समय यह स्वर आमतौर पर सुना जा सकता था कि  मन चाहा विभाग या मंत्री पद न मिलने पर फंला व्यक्ति कोपभवन में जाकर बैठ गया, जिसे हमारी मिडिया मलाईदार विभाग की संज्ञा देती थी। आखिर क्या था वह सब ?

नरसिम्हा राव जी की सरकार के गठन से केंद्र में समझौतों पर चलने वाली सरकारों का दौर शरू हुआ। संसद का गठन नम्बर के आधार पर होने लगा। स्वयंहित या दल हित सर्वोपरी हो गए। स्वस्थ परम्पराओ का ह्रास होने लगा और राजनीतिक कलाबाजी का दौर शुरू हो गया। राजनीतिक पार्टिया अपने नफे-नुकसान का आंकलन स्वयं हित में करने लगी व  देश हित गौण हो गया। इस दौर में अटल जी थोड़े मजबूती से खड़े हुए तो राजनितिक बुड़बक लोगो को वह पसंद नहीं आये। विभिन्न जुमलो के द्वारा बार-बार जनता को बरगला कर सत्ता हासिल की गई। तुष्टीकरण और जातीवाद का माहौल बनाकर वोट हथिया लिए गए। समाजिक न्याय के नाम पर बे-सर पैर की घोषणा की गई। हर तरफ वर्ग-भेदों की दिवार खड़ी हो गई। विघटनकारी तत्वों को बदावा देकर राजनितिक हित साधे गए। यहाँ तक की सामाजिक क्षेत्र व राष्ट्रहित में कार्य करने वाले समाजिक संगठनों को गालिया दी गई क्योंकि वे उन्हें किसी काम के नहीं लगे। ऐसे समय किसी एक से आस थी तो वह कोंग्रेस थी जो पुरे देश का नेतृत्व कर रही थी परन्तु समय के फफेड़ो में उसका सबसे ज्यादा ह्रास हो चूका था। मनमोहन जी के समय उसने भी क्षेत्रीय दलों के सामने अपने सभी हथियार डाल दिए और स्वयं भी क्षेत्रीय दलों का व्यवहार करने लगी। सरकार सत्तालोलुपो के हाथ में चली गई, देश के खजाने में सेंधमारी शुरू हो गई। देश हित सामने नहीं था, खासतौर पर पूर्वोतर राज्यों की हालत बेहद कमजोर होती जा रही थी। ऐसे में अन्ना आन्दोलन का जन्म हुआ, राष्ट्रवादी संगठन जो अंदर खाने अपने काम में लगे थे आन्दोलन के साथ खड़े हुए और देश में नई चेतना का संचार हुआ।

अब बारी थी एक मजबूत नेता की जिसकी कमी नरेंद्र मोदी जी ने पूरी की। राष्ट्रवादी ताकतों को मजबुती मिली, देश-हित व समाजहित में कार्य करने वालो की पूछ शुरू हो गई। देश हित में कठोर फैसले लिए गए। सम्भाविक था, देश हित में सभी को कुछ न कुछ तो त्याग करना ही पड़ेगा।

वर्तमान में भी मोदी जी को कठोर मेहनत करनी पड़ रही है। मोदी जी का यह निर्णय की केंद्र का जो रुपया राज्य सरकारों को जिस मद में भेजा जा रहा है उसे उसी मद में खर्च करना होगा, विभिन्न राज्य सरकारों को पसंद नहीं आ रहा। वह रुपया भ्रष्टाचार की भेट नहीं चढ़ पा रहा, अपनी मर्जी से पैसे का बन्दोबस्त न कर पाने के कारण राज्य सरकारों के प्रतिनिधि नाराज दिखाई देते है। कुछ जरूरत से ज्यादा महत्वकांक्षी है। आने वाले समय में कुछ साथ रहने वाले भी कोप भवन में जाते दिखाई पड़ेगे। शायद बहुत से लोगो को राजनीति में चरित्रवान लोग पसंद नहीं, उनको बुड़बक लोग पसंद है, ताकि अपने हित साधे जा सके। वे लोग जब से यह सरकार बनी है तभी से सक्रीय है, विभिन्न प्रकार के जुमले हवा में छोड़े जाते रहे है, कभी इंटोरलेंट तो कभी कुछ। हमारे यंहा कहावत है, “राई का पहाड़ बनाना”, परन्तु आजकल बिना राई के पहाड़ खड़े किये जाते है, झूठ को बार-बार दोहराया जाता है ताकि सत्य लगने लगे।

आज भारत देश के पास क्या नहीं है, हम कह सकते हैं यह धरती पुरे विश्व को अपने में समेटे है। दुनिया के किसी देश के पास ऐसा मैनेजमेंट नहीं जो अकेले दम 130 करोड़ लोगों का पेट भर सके, भारत माता 130 करोड़ लोगो का पेट भरती है। यह राम राज्य नहीं तो क्या है? हमें गर्व करना चाहिए कि हम जंहा भी गए हमने उस धरती के विकास में योगदान दिया है। हमे अपने यंहा सुधारों की आवश्यकता जरुर है, जिन्हें करने की शक्ति हमारे में है। जरूरत है भरत होने की, असल रामराज्य आते देर नहीं लगेगी। अब कोप भवन के त्याग का समय है, जो कोपभवन नहीं त्यागते तो उन्हें त्यागने का समय आ गया है, क्योंकि असल ताकत आज हमारे पास है, लोकतंत्र की ताकत 2019 के लिए।