नोटबंदी अर्थशास्त्री व समाजशास्त्रियों के लिए शोध का विषय

नोटबन्दी भारत व विश्व के बुद्धिजीवी वर्ग के लिए गम्भीर शोध का विषय है। नोटबंदी ने मुद्रा को फ़िल्टर करने का कार्य किया। बड़े पैमान पर नक़ली नोट चलन से बाहर हो गए। नक़ली नोट कितनी मात्रा में चलन में थे इसका सही आँकड़ा कोई नहीं बता सकता, केवल अनुमान के मुताबिक़ हर 100, 500 व 1000 की हर गड्डी में इनकी संख़या 2 से लेकर 4 तक हो गई थी। इस हिसाब को माने तो यह संख्या कई हज़ार करोड़ तक पहुँच जाएगी। नक़ली नोट किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए कितने हानिकारक है ये सभी जानते है।अगर माने कि किसी अन्य देश द्वारा किसी दूसरे देश में नक़ली नोट भेजे जाते है, तो इसका अर्थ है कि वह देश उस देश के श्रम का भी दोहन करता है।

नोटबंदी ने बढ़ी हुई मुद्रास्फीति पर ब्रेक लगा दिया, ख़ासतौर से रियल स्टेट सेक्टर की तेज़ी पर ब्रेक लगा। रियल स्टेट की हालत यह हो गयी थी की मध्यम वर्ग के परिवारों को भी अपना घर एक सपने के समान हो गया था। आज नोटबंदी के बाद अपने घर का सपना देखने वालों में उम्मीद ही नहीं जगी बल्कि उन्हें अपने घर के लिए ज़्यादा संघर्ष भी नहीं करना पड़ेगा।

मुझे समझ नहीं आता कि समाजवादियो ने नोटबंदी का विरोध क्यों किया? मुझे लगता है समाजवादी लोगों ने चिंतन करना ही छोड़ दिया है, या वे केवल नाम के समाजवादी रह गये है। नोटबंदी ने अमीर व ग़रीबों को नज़दीक लाने का काम किया है। ग़रीब लोगों को भी लगा है की समाज में उनकी भी कुछ हैसियत है। उनके बीच बहुत चौड़ी हो चुकी खाई तो नहीं पटी पर कम अवश्य हो गयी। अपने-पन का यह अहसास भी बहुत बड़ी बात है।

नोटबंदी किसी भी सरकार के लिए बहुत ही हिम्मत का कार्य होता जिसे वर्तमान की सरकार में प्रधानमंत्री मोदी जी ने किया। हमारे पढ़े-लिखे और सामर्थ्यवान लोग अपने तुच्छ आर्थिक व राजनीतिक हितो के चलते मोदी जी की पीठ नहीं थपथपा सकते। विपक्ष द्वारा लगातार भ्रम खड़ा किया गया की नोटबंदी ने व्यापार चौपट कर दिया, किंतु हक़ीक़त यह है कि न तो किसी ने खाना छोड़ा, ना ही किसी ने पहनना और ना ही अपनी ज़रूरत के संसाधनो पर ख़र्च करना। हाँ, जनता को कुछ दिन तकलीफ़ अवश्य उठानी पड़ी। ख़ासतौर पर विवाह-शादियों के अवसर पर। जैसा मेने पहले कहा है कि फ़र्क़ पड़ा तो रियल स्टेट सेक्टर पर अवश्य पड़ा जो अंतत: आम जनता के फ़ायदे वाला ही साबित हुआ। नोटबंदी ने बैंकिंग व्यवस्था को चौपट किया यह कहना तो बिल्कुल आधारहिन है क्योंकि बैंकों में बड़े पैमाने पर नगदी जमा हुआ था, जो की धीरे-धीरे वापस बाहर आया ।

भारत जैसे विशाल देश में नोटबंदी विश्व के लिए एक अनोखी घटना थी। किसी देश की जनता का अपने नेता पर ऐसा अटूट विश्वास आश्चर्य का विषय था। प्रधानमंत्री मोदी के विरोधी चाहे जो भी कहे पर विश्व के समाजशास्त्री व अर्थशास्त्री इस नोटबंदी का गम्भीर चिंतन अवश्य करेंगे।